साइबर अपराधों की जांच में मजबूत होगी छत्तीसगढ़ पुलिस की क्षमता, IIIT देगा तकनीकी कौशल

छत्तीसगढ़ में साइबर अपराधों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से पिछले तीन वर्षों में तेजी से साइबर थाने खोले गए और स्टाफ भी तैनात किया गया। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि रायपुर और बिलासपुर को छोड़कर राज्य के अधिकांश जिलों में पुलिसकर्मियों को तकनीकी जांच के बुनियादी तरीके भी नहीं आते हैं। थानों में मामले दर्ज होने के बावजूद, विवेचकों को यह स्पष्ट नहीं होता कि पीड़ित से कौन सी तकनीकी जानकारी जुटाई जाए या ठगी गई रकम के रूट को कैसे ट्रैक किया जाए। इस तकनीकी अक्षमता का परिणाम यह है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे नए पैंतरों का उपयोग कर ठगी करने वाले अपराधी पुलिस की पहुंच से बाहर हैं।
बीते तीन वर्षों के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में लगभग 67 हजार लोगों से 700 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी हुई है। इसके बावजूद, पुलिस केवल 1, 800 पीड़ितों की रकम ही वापस करा सकी है, जो कुल ठगी की रकम का एक बहुत छोटा हिस्सा है। पुलिस की इसी गंभीर तकनीकी कमजोरी को दूर करने के लिए स्टेट साइबर को-ऑर्डिनेशन सेंटर (S4C) ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। S4C ने ट्रिपल आईटी (IIIT) के साइबर विशेषज्ञों के साथ एक अनुबंध किया है, जिसके तहत पुलिसकर्मियों को विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा।
इस अनुबंध के तहत, ट्रिपल आईटी के विशेषज्ञ पुलिसकर्मियों को 70 दिनों की एक विशेष ट्रेनिंग देंगे। इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य पुलिसकर्मियों को साइबर अपराधों की जांच के लिए आवश्यक तकनीकी कौशल से लैस करना है, ताकि वे डिजिटल साक्ष्य जुटाने, मनी ट्रेल को ट्रैक करने और आधुनिक साइबर ठगी के तरीकों को समझने में सक्षम हो सकें। यह पहल पुलिस की जांच क्षमताओं को मजबूत करने और साइबर अपराधियों को पकड़ने में मदद करेगी।
प्रशिक्षण कार्यक्रम के विस्तृत शेड्यूल को अंतिम रूप देने के लिए, सभी पुलिस अधीक्षकों से उनके अधीन कार्यरत साइबर और सामान्य थानों में पदस्थ अधिकारियों और जवानों के नाम मांगे गए हैं। इन नामों के प्राप्त होने के बाद ही प्रशिक्षण का विस्तृत कार्यक्रम तय किया जाएगा, जिसमें बैचों का गठन और प्रशिक्षण की तिथियां शामिल होंगी। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि अधिक से अधिक पुलिसकर्मी इस महत्वपूर्ण प्रशिक्षण का लाभ उठा सकें।
साइबर अपराधियों तक पुलिस के न पहुंच पाने की तीन मुख्य वजहों में से एक है डिजिटल साक्ष्य जुटाने में नाकामी। कई पीड़ित घबराहट या जानकारी के अभाव में थाने पहुंचने से पहले ही अपने मोबाइल से संदिग्ध मैसेज, लिंक या कॉल डिटेल्स डिलीट कर देते हैं। प्रशिक्षित स्टाफ की कमी के कारण, पुलिस इन महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्यों को रिकवर करने और अपराध की कड़ियों को जोड़ने में पिछड़ जाती है, जिससे जांच आगे नहीं बढ़ पाती।
दूसरी प्रमुख वजह तबादलों से बिगड़ी व्यवस्था है। दो साल पहले जिन पुलिसकर्मियों को साइबर जांच की ट्रेनिंग दी गई थी, उनके तबादले दूसरे थानों में हो गए हैं। उनकी जगह आए नए स्टाफ को साइबर इन्वेस्टिगेशन का व्यावहारिक अनुभव नहीं है, जिसके कारण अधिकांश थानों में साइबर अपराधों पर कार्रवाई केवल एफआईआर दर्ज करने तक ही सीमित रह जाती है और आगे की जांच प्रभावी ढंग से नहीं हो पाती।
तीसरी बड़ी वजह मनी ट्रेल ट्रैक करने में उलझन है। साइबर ठग ठगी की रकम को कई लेयर्स (मल्टीपल बैंक खातों) में ट्रांसफर कर देते हैं, जिससे उसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। अधिकांश विवेचकों को यह स्पष्ट प्रक्रिया ही नहीं पता कि संबंधित वित्तीय संस्थाओं से तेजी से समन्वय स्थापित कर ट्रांजेक्शन की पूरी चेन का पता कैसे लगाया जाए। इस कमी के कारण ठगी की रकम वापस दिलाना और अपराधियों तक पहुंचना बेहद कठिन हो जाता है।
राज्य में ढांचागत संकट भी एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि 33 जिलों में से केवल 13 जिलों में ही साइबर थाने संचालित हैं। इसका मतलब है कि प्रदेश के 20 जिलों में अभी तक कोई साइबर थाना नहीं है। इसके अलावा, जो 13 साइबर थाने संचालित हैं, उनमें भी प्रशिक्षित विवेचकों की संख्या कम है। जिन जिलों में साइबर थाने हैं, उनमें रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, बस्तर, अंबिकापुर, राजनांदगांव, जशपुर, रायगढ़, कोरबा, जांजगीर-चांपा, बलौदाबाजार, धमतरी और महासमुंद शामिल हैं।




